अग्रलेख- प्रितम राज बड़ौले, कार्य परिषद सदस्य, डॉ.बी. आर.आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय,महू, मध्यप्रदेश

दि. 29 दिसंबर | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े शहरों, दरबारों और चर्चित नायकों तक सीमित नहीं है। यह इतिहास उन जंगलों, पहाड़ियों और नदियों के किनारों पर भी लिखा गया है, जहाँ जनजातीय समाज ने अपने स्वाभिमान और आज़ादी के लिए प्राणों की बाज़ी लगाई। ऐसे ही एक अनकहे, परंतु अत्यंत गौरवशाली नायक हैं, शहीद भीमानायक, जिन्हें सम्मानपूर्वक “निमाड़ का शेर” कहा जाता है।1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जब देशभर में फैल रहा था, तब मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल से उठी भीमानायक की हुंकार ने अंग्रेजी साम्राज्य को यह एहसास करा दिया कि आज़ादी की आग केवल शहरों तक सीमित नहीं है। वनों और दुर्गम पहाड़ियों में रहने वाला जनजातीय समाज भी इस संघर्ष का सशक्त स्तंभ था। भीमानायक ने जनजातियों को संगठित कर न केवल अपने अधिकारों की रक्षा की, बल्कि मातृभूमि की स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानते हुए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।इतिहास गवाह है कि जब महान क्रांतिकारी तात्या टोपे अंग्रेजी घेराबंदी से बचते हुए नर्मदा तट पर पहुँचे और नदी के सभी घाटों पर कड़ा पहरा था, तब भीमानायक ने अपने क्षेत्रीय ज्ञान और रणनीतिक सूझबूझ से क्रांति की धारा को आगे बढ़ाया। तात्या टोपे और उनकी सेना को सुरक्षित नर्मदा पार कराना केवल एक सैन्य कार्यवाही नहीं थी, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा देने वाला ऐतिहासिक क्षण था।अम्बापानी का युद्ध भीमानायक के शौर्य का सर्वोच्च प्रतीक है। हजारों जनजातीय योद्धाओं के साथ छापामार युद्ध पद्धति अपनाकर उन्होंने आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेजी सेना को भारी क्षति पहुँचाई। आज भी अम्बापानी की पहाड़ियाँ उस वीरता, त्याग और बलिदान की मूक साक्षी हैं, जहाँ अंग्रेजी सत्ता को घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा।स्वाभाविक था कि भीमानायक की बढ़ती लोकप्रियता और निर्भीक नेतृत्व से अंग्रेजी हुकूमत भयभीत हो उठे। छल और विश्वासघात के माध्यम से उन्हें गिरफ्तार कर अंडमान-निकोबार के पोर्ट ब्लेयर, कुख्यात काला पानी भेज दिया गया। अमानवीय यातनाएँ भी उनके संकल्प को नहीं तोड़ सकीं। अंततः 29 दिसंबर 1876 को उन्होंने उसी कारागार में राष्ट्र के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।शहीद भीमानायक केवल रणभूमि के वीर नहीं थे, वे जनचेतना के अग्रदूत थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि दृढ़ संकल्प, संगठन और स्वाभिमान के सामने सबसे शक्तिशाली साम्राज्य भी टिक नहीं सकता। आज, जब देश का युवा वर्ग दिशाहीनता, संसाधनों की कमी और तात्कालिक लाभों में उलझता दिखाई देता है, भीमानायक का जीवन एक स्पष्ट संदेश देता हैI राष्ट्रहित व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर है, सीमित संसाधनों में भी असाधारण लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं, और सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले।29 दिसंबर का यह बलिदान दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारी आज़ादी केवल कुछ नामों की देन नहीं, बल्कि अनगिनत ज्ञात-अज्ञात वीरों के रक्त और त्याग से बनी है। शहीद भीमानायक निमाड़ का शेर उनमें अग्रणी हैं।आज आवश्यकता है कि उनके संघर्ष को केवल स्मरण न किया जाए, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर राष्ट्र, समाज और लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाने का संकल्प लिया जाए।