
नई दिल्ली, 14 मार्च: (उपसंपादक: सतिश वागरे ) 170 दिन इतने लंबे अरसे तक राजस्थान की जोधपुर जेल में बंद रहने के बाद आखिरकार सोनम वांगचुक को रिहा कर दिया गया । गृह मंत्रालय ने शनिवार को तत्काल प्रभाव से उनकी हिरासत रद्द कर दी । सरकार का कहना है कि, लद्दाख में शांति और आपसी विश्वास का माहौल बनाने के लिए यह फैसला लिया गया है । लेकिन सवाल यह है कि जिस शख्स को छह महीने पहले देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया था, वह अचानक इतना सुरक्षित कैसे हो गया? क्या सरकार की मंशा बदली या फिर सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने बेबुनियाद साबित होने का डर था? सोनम वांगचुक को पिछले साल 26 सितंबर को लेह हिंसा के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था । सरकार का आरोप था कि, वह युवाओं को ‘अरब स्प्रिंग’ जैसा विद्रोह करने के लिए उकसा रहे थे, नेपाल और बांग्लादेश की तरह हालात पैदा करना चाहते थे । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने जब यह मामला आया, तो सरकार की दलीलें बिखरने लगीं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि, वांगचुक के भाषणों को भड़काऊ बताना सरकार का “कुछ ज़्यादा ही मतलब निकालना” है । 16 फरवरी को तो कोर्ट ने सरकार द्वारा पेश किए गए अनुवाद पर ही सवाल उठा दिए। बेंच ने कहा, “आपका अनुवाद 7-8 मिनट का है, जबकि मूल भाषण केवल 3 मिनट का। AI के जमाने में अनुवाद की सटीकता 98% होनी चाहिए।” यानी सरकार वांगचुक के मुंह में वे बातें डाल रही थी जो उन्होंने कभी कही ही नहीं थीं! यह कोई आम केस नहीं था। पिछले पांच महीनों में यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में करीब 24 बार सूचीबद्ध हुई । और हर बार केंद्र सरकार ने सुनवाई टालने का अनुरोध किया। कभी सॉलिसिटर जनरल की बीमारी का बहाना, कभी भाषणों की जांच के लिए समय मांगा गया । 10 मार्च को जब वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने आपत्ति जताई कि, सरकार बार-बार सुनवाई टालकर “गलत संदेश” भेज रही है, तब जाकर कोर्ट ने 17 मार्च की तारीख तय की । और उससे ठीक तीन दिन पहले. सरकार ने वांगचुक को रिहा कर दिया। यह संयोग है या सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के आगे सरकार की नतमस्तकी? इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. उदित राज का वह पुराना बयान फिर से याद आ रहा है, जो आज और ज्यादा तीखा नजर आता है। उन्होंने कहा था,“लद्दाख कोई आम इलाका नहीं है, यह सीधे चीन की सीमा से लगा हुआ अत्यंत संवेदनशील प्रदेश है। ऐसे में वहां कोई भी कार्रवाई करने से पहले सावधानी बरतना अनिवार्य है।” डॉ.उदित राज ने उस वक्त ही भांप लिया था कि, सीमा पर सियासत करना खतरनाक हो सकता है। उन्होंने कहा था,
“देश के कोने-कोने में विपक्षियों पर ईडी-सीबीआई का डंडा चलाने के आरोप लगते हैं, लेकिन सीमावर्ती इलाके में यही हथकंडे अपनाने से बड़े नुकसान हो सकते हैं।” आज वही हुआ। सरकार को अपनी गलती माननी पड़ी, भले ही वह सीधे तौर पर न कहे। डॉ. उदित राज हमेशा से संविधान की रक्षा की बात करते आए हैं। क्रिसमस के मौके पर उन्होंने देशवासियों को संदेश दिया था कि “संविधान ही भारत की असली ताकत है, जो हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार देता है। धर्म, जाति और भाषा से ऊपर उठकर संविधान को बचाना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।” सोनम वांगचुक के मामले में भी उनका यही रुख था। वह जानते थे कि लद्दाख की जनता के दिलों में बसने वाले इस चेहरे को सिर्फ NSA के बूते पर दबाया नहीं जा सकता। डॉ.उदित राज ने सवाल उठाया था, “अगर सीमा पर सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है, तो वहां के लोगों को अपना नेता देने से क्यों रोका जा रहा था?” सोनम वांगचुक की रिहाई के साथ ही लद्दाख की मांगें और मुखर हो गई हैं। राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल करना ये वे मुद्दे हैं जिन्हें अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार ने खुद कहा है कि “उच्च-स्तरीय समिति” के जरिए बातचीत से मुद्दों का समाधान निकाला जाएगा । लेकिनसबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जो सरकार छह महीने तक एक शख्स को देश के लिए खतरा बताकर जेल में सड़ाती रही, उस पर अब भरोसा कौन करेगा?डॉ.उदित राज ने ठीक ही कहा था कि “लद्दाख के लोगों की नजर में वांगचुक का कद बहुत बड़ा है। उनके खिलाफ चलाया गया अभियान वहां की जनता को कभी मंजूर नहीं होगा।” सरकार के पास अब सिर्फ एक ही रास्ता है – बिना किसी शर्त के लद्दाख की जनता से सीधा संवाद करना, उनकी मांगों को सुनना और संवैधानिक दायरे में हल निकालना। क्योंकि सीमा पर सियासत नहीं, संवेदनशीलता चाहिए। और यही उदित राज के उस सवाल का सबसे सच्चा जवाब होगा, जो आज भी हवा में लटका हुआ है।
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