नई दिल्ली, 17 दिसंबर 2025 (उपसंपादक:सतीश वागरे ) आज दिल्ली के कृषि भवन पर एक जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ, जहाँ असंगठित कामगार एवं कर्मचारी कांग्रेस (केकेसी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज के नेतृत्व में ‘विकसित भारत रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025’ (VB-G RAM-G Bill) की प्रतियाँ जलाकर इसे रद्द करने की माँग की गई।

यह विरोध महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म करने की साजिश के खिलाफ था। डॉ. उदित राज ने स्पष्ट किया कि, यह विधेयक मनरेगा को समाप्त करने का षड्यंत्र है, जिसे मजदूर संगठनों से बिना कोई सलाह-मशविरा किए पेश किया गया है। उन्होंने इसके खतरनाक प्रावधानों को उजागर कियाI केंद्र सरकार की तानाशाही शक्ति, नए विधेयक के तहत, काम पाने का अधिकार केवल उन्हीं ग्रामीण इलाकों में रहेगा, जिन्हें केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी। यानी, काम गारंटी अब केंद्र की “मर्जी” पर निर्भर होगी, जनता के कानूनी अधिकार पर नहीं।माँग पर काम से सीमित बजट की ओर मनरेगा की ताकत थी कि, धन का आवंटन काम की माँग (डिमांड) के आधार पर होता था। नए विधेयक में, केंद्र सरकार पहले से एक सीमित रकम (स्टैंडर्ड अलॉटमेंट) तय करेगी। यानी, अब बजट के हिसाब से माँग को कुचला जाएगा, न कि माँग के हिसाब से बजट बनेगा।

जो राज्य इस सीमा से अधिक खर्च करेंगे, उन्हें वह खर्च खुद उठाना होगा। राज्यों पर वित्तीय डाका, मनरेगा में केंद्र और राज्य का खर्च का अनुपात लगभग 90:10 था। नए विधेयक में इसे अधिकांश राज्यों के लिए 60:40 कर दिया गया है। यह गरीब राज्यों पर भारी बोझ है, जिससे वे मजदूरों की माँग दर्ज करने से भी कतराएँगे। स्थानीय स्वायत्तता की हत्या हुई, मनरेगा में ग्राम सभाएँ स्थानीय जरूरतों के हिसाब से योजना बनाती थीं। नए विधेयक में एक केंद्रीकृत ‘राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक’ (नेशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैक) स्थानीय योजना बनाने की जगह लेगा। यह संविधान के 73वें संशोधन और पंचायती राज की भावना के खिलाफ है। मनरेगा में आधार-आधारित भुगतरण प्रणाली (ABPS) और डिजिटल निगरानी ने हजारों मजदूरों को काम से बाहर कर दिया है। नए विधेयक में बायोमैट्रिक पहचान (अंगुलिछाप/आँख की पुतली स्कैन) और जीपीएस ट्रैकिंग को और जबरदस्ती लागू किया जाएगा, जो मजदूरों के लिए समस्याएँ पैदा करेगा। मनरेगा साल के 365 दिन काम की गारंटी देता था। नए विधेयक में “ब्लैकआउट अवधि” का प्रावधान है, जिसके तहत खेती के मौसम में 60 दिनों तक काम बंद रहेगा। इससे महिला मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगी।.

डॉ. उदित राज ने जोर देकर कहा कि ‘विकसित भारत रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन’ विधेयक कोई सुधार नहीं, बल्कि मजदूरों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला है। यह एक अधिकार-आधारित कानून को केंद्र सरकार की मनमानी पर छोड़ी गई राहत योजना में बदल देगा। केकेसी इस विधेयक का पूरी तरह विरोध करता है और इसकी तत्काल वापसी की, माँग करता है। संगठन ने सभी लोकतांत्रिक ताकतों से मनरेगा को बचाने और इस प्रतिगामी व एकतरफ़ा फैसले का विरोध करने का आह्वान किया।इस विरोध प्रदर्शन में डॉ. उदित राज के अलावा केकेसी के
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रमेश कुमार यादव, संजय गाबा, राष्ट्रीय सचिव शाहिद अली, राष्ट्रीय समन्वयक सी.पी. सोनी व आदित्य राजपूत, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष विनोद पवार तथा असम प्रदेश अध्यक्ष मिर्ज़ा बोरा सहित सैकड़ों पदाधिकारी व कार्यकर्ता शामिल हुए।मनरेगा हटाओ, गरीब मारो की साजिश नहीं चलेगी!