
नई दिल्ली 25 मार्च, 2026 (संपादक: वि. पी. सिंग)
भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों की चारदीवारी के भीतर वर्षों से जातिगत भेदभाव और संस्थागत हिंसा का जो दंश झेला जा रहा था, उसके खिलाफ ‘यूजीसी नियम 2026’ एक आशा की किरण बनकर आया था। किन्तु जैसे ही यह नियम वंचितों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने की ओर अग्रसर हुआ, वैसे ही इसे व्यवस्थागत साजिशों के अंधेरे में धकेलने की कोशिशें शुरू हो गईं। जंतर-मंतर पर ‘डोमा परिसंघ’ का गर्जनापूर्ण प्रदर्शन और पूर्व सांसद डॉ. उदित राज की हुंकार मात्र एक नीति को लागू करने की मांग नहीं है, बल्कि यह उस ‘मेरिट’ के ढोंग के खिलाफ युद्ध का ऐलान है,

जिसका इस्तेमाल सदियों से वंचित वर्गों को हाशिए पर रखने के लिए किया जाता रहा है। यह विडंबना ही है कि जिन नियमों को दो माताओं, राधिका वेमुला और अबेदा तडवी ने अपने बच्चों को खोने के बाद सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज पर लड़कर हासिल किया, उसे आज ‘भेदभावपूर्ण’ बताकर बदनाम किया जा रहा है।

डॉ. उदित राज ने तार्किक रूप से स्पष्ट किया है कि, यूजीसी नियम 2026 कोई खैरात नहीं, बल्कि 2012 के निष्प्रभावी नियमों के खिलाफ एक लंबी न्यायिक लड़ाई का परिणाम है।

यह नियम उन लाखों छात्रों के संघर्ष की उपज है, जिन्होंने परिसरों में जातिवाद के कारण अपनी मेधा को भेंट चढ़ते देखा। लेकिन आज यही नियम जब ‘इक्विटी कमेटी’ जैसी संरचना के माध्यम से दलितों, पिछड़ों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की बात करता है, तो इसे ‘सामान्य वर्ग के खिलाफ’ प्रचारित किया जा रहा है।

प्रश्न उठता है कि क्या भाजपा और आरएसएस समर्थित संगठनों की नज़र में ‘समानता’ का अर्थ केवल एक वर्ग विशेष का एकाधिकार है? डॉ. उदित राज का यह आरोप गंभीर है कि, इस भ्रम की खेती जानबूझकर की जा रही है ताकि विश्वविद्यालयों में जवाबदेही तय न हो सके। जब तक शैक्षणिक परिसरों में ‘रोहित वेमुला’ और ‘पायल तडवी’ जैसे मेधावी छात्र जातिवाद की भेंट चढ़ते रहेंगे, तब तक भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने का दावा खोखला ही रहेगा।

इस आंदोलन ने एक और कड़वी सच्चाई को उजागर किया है, राजनीतिक अवसरवादिता। जब बहुजन हितों की बात करने वाले दल भी सर्वोच्च न्यायालय के स्थगन का स्वागत करते हैं, तो डॉ. उदित राज का दर्द वाजिब हो जाता है। यह वंचित वर्गों के संवैधानिक हितों के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात है। जो लोग सत्ता के गलियारों में बैठकर जाति-विरोधी बयानबाजी करते हैं, वही जब निर्णायक मोड़ पर चुप्पी साध लेते हैं या न्यायालय के अंतरिम आदेशों का स्वागत करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है

कि वंचितों का मुद्दा उनके लिए महज राजनीतिक पूंजी मात्र है। आंदोलन का एक और ज्वलंत पहलू यूपीएससी साक्षात्कार में होने वाला भेदभाव है। डॉ. उदित राज, जो स्वयं शासन तंत्र का हिस्सा रहे हैं, का यह दावा कि दलित और ओबीसी अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में जानबूझकर कम अंक दिए जाते हैं, पूरे चयन तंत्र की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने जो मुद्दा उठाया है, वह कार्मिक मंत्रालय के उन दावों की हवा निकाल देता है जिनमें कहा जाता है कि साक्षात्कार बोर्ड को अभ्यर्थी की पृष्ठभूमि का पता नहीं होता। यह एक ‘खुला रहस्य’ है कि व्यक्तित्व परीक्षण के नाम पर अक्सर सामाजिक पृष्ठभूमि का परीक्षण किया जाता है। ‘डोमा परिसंघ’ ने जंतर-मंतर से देशव्यापी आंदोलन का बिगुल फूंककर सरकार को स्पष्ट चेतावनी दे दी है। यह लड़ाई केवल कागजों पर नियम दर्ज कराने की नहीं, बल्कि संस्थानों के भीतर उस सवर्ण मानसिकता को तोड़ने की है जो विविधता से डरती है। डॉ. उदित राज के नेतृत्व में उठा यह तूफान थमने वाला नहीं है। यदि सरकार ने यूजीसी नियम 2026 को तुरंत प्रभावी रूप से लागू नहीं किया, चयन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता नहीं लाई, और साक्षात्कारों में होने वाले जातिगत पूर्वाग्रह को समाप्त नहीं किया, तो यह आक्रोश सड़कों से निकलकर सत्ता के गलियारों की चूलें हिला देगा। सामाजिक न्याय कोई दया नहीं, हमारा संवैधानिक अधिकार है, और इसे छीनने की हर कोशिश का जवाब अब सड़कों पर दिया जाएगा। इतिहास गवाह है कि संवैधानिक अधिकारों के लिए छेड़ा गया कोई भी आंदोलन तब तक नहीं थमता, जब तक न्याय की मांग पूरी न हो जाए।