
(मुख्य संपादक मध्यप्रदेश: सचिन कमल पटेल) —— निमाड़ अंचल की लोकसंस्कृति में भाई-बहन के अटूट प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक वीरपोस (ईरपोस) पर्व इस वर्ष 23 अगस्त को पूरे क्षेत्र में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। रक्षाबंधन के पावन पर्व के पश्चात आने वाला यह अनूठा त्योहार निमाड़ की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है, जिसमें भाई स्वयं बहन के घर जाकर उसे रक्षाबंधन के अवसर पर मायके आने का ससम्मान निमंत्रण देता है। इस पर्व की एक खास बात यह है कि भाई अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार गेहूं, चावल, गुड़, घी, कपड़े, नारियल और मिठाई सहित विभिन्न शगुन सामग्री लेकर बहन के द्वार पर पहुंचता है, जो उसके स्नेह और अपनत्व को दर्शाता है। बहन भी इस अवसर के लिए पूरे दिन अपने भाई की प्रतीक्षा करती है और ज्यों ही वह घर आता है, वह विधिवत तिलक लगाकर, आरती उतारकर उसका स्वागत करती है तथा भाई की सुख, समृद्धि और दीर्घायु की मंगलकामना करती है।

इसके बाद बहन अपने हाथों से भाई को स्नेहपूर्वक भोजन करवाती है, जो उनके रिश्ते की गहराई को और मजबूत करता है। वीरपोस पर्व की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा रक्षाबंधन पर बहन को मायके बुलाने का निमंत्रण देना है, जो केवल एक औपचारिक रस्म मात्र नहीं है, बल्कि बहन के प्रति मायके के प्रेम, सम्मान और आत्मीयता का जीवंत प्रतीक माना जाता है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले के समय में जब आवागमन के साधन सीमित थे, तब यह बुलावा बहनों के लिए मायके जाने का एकमात्र अवसर हुआ करता था और आज भी यह परंपरा उसी गंभीरता और उल्लास के साथ निभाई जा रही है। आधुनिकता और शहरीकरण के इस दौर में जब पारिवारिक रिश्तों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं, वीरपोस जैसी लोकपरंपराएं निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने और पारिवारिक मूल्यों को जीवित रखने का कार्य कर रही हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस पर्व में कोरा दिखावा नहीं है, बल्कि सच्चा स्नेह और विश्वास है, यही कारण है कि आज भी युवा पीढ़ी इसे उसी उत्साह के साथ निभा रही है। पूरे निमाड़ क्षेत्र में इस बार वीरपोस की तैयारियां जोरों पर हैं और बहनों को मायके बुलाने के लिए भाई शगुन सामग्री लेकर निकलेंगे, जिससे इस पर्व की गरिमा और भव्यता बरकरार रहेगी। इस अनोखी परंपरा ने न केवल भाई-बहन के रिश्ते को एक नई पहचान दी है, बल्कि निमाड़ की समृद्ध लोकसंस्कृति को भी वैश्विक पटल पर एक अलग पहचान दिलाई है।