
नई दिल्ली 10 मार्च (उपसंपादक :सतीश वागरे) नेपाल के युवाओं ने सत्ता पलट कर दिखा दिया कि, जब हौसले बुलंद हों, तो सरकारें गिर सकती हैं। लेकिन भारत में, पेपर लीक हो जिसने युवाओं के भविष्य की नींव हिला दी, शिक्षा इतनी महंगी हो गई है कि वह एक सपना बनकर रह गई है, और सरकारी नौकरियां निजीकरण के हवाले खत्म होती जा रही हैं, फिर भी सड़कों पर वह विद्रोह नहीं दिखता जो दिखना चाहिए। सवाल उठता है कि आखिर क्यों? क्यों एक विशाल युवा आबादी वाला देश, जिसके पास सबसे बड़ा लोकतांत्रिक इतिहास है, आज सबसे बड़े संकटों पर खामोश है? पैसा सवाल काँग्रेस परत का डॉक्टर उदित राहिलेले युवा पुच्छा हैIसबसे बड़ा रोड़ा वह नैरेटिव है जो हमें एकजुट नहीं होने देता। जब पेपर लीक का मुद्दा उठता है, तो उसे हिंदू-मुसलमान में बांट दिया जाता है। जब बेरोजगारी का मुद्दा उठता है, तो उसे जाति और धर्म के एंगल से देखा जाता है। सरकार के आईटी सेल ने इसी भ्रम और गलत सूचना के जाल को बुनकर युवाओं की एकजुटता को तोड़ दिया है। जब असली दुश्मन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार की पहचान ही धुंधली हो जाए, तो आंदोलन की आग कैसे भड़केगी? आज का युवा गुस्सा तो बहुत है, लेकिन वह उसे सड़क पर निकालने की बजाय अपने मोबाइल स्क्रीन पर ही उंडेल देता है। रील्स, वीडियो गेम और सोशल मीडिया ने आक्रोश की इस ऊर्जा को डिजिटल दुनिया में कैद कर लिया है। जो ऊर्जा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में जलनी चाहिए, वह एक ट्रेंडिंग हैशटैग पर बहस में भाप बनकर उड़ जाती है। यह डिजिटल अफीम युवाओं को सुस्त और बेहोश कर रही है। ऐसे भी आरोप डॉ. उदित राज ने देश के युवावो पे लगाये है Iसरकारी तंत्र भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। न्याय व्यवस्था इतनी धीमी है कि पेपर लीक करने वाले सरकारी अधिकारी या निजी कोचिंग संचालक सजा से बच जाते हैं। ऐसे में, एक आम युवा के मन में यह बात बैठ जाती है कि “कुछ नहीं हो सकता”। इस निराशा ने भाग्यवाद को जन्म दिया है। लोग कराहते हैं, लेकिन यह मानकर चुप हो जाते हैं कि यही उनका भाग्य है। सरकार और मीडिया के प्रोपेगंडा ने इस पाखंड को हवा दी है कि “देश बदल रहा है”, जबकि असलियत में देश का युवा बदहाली के गड्ढे में धंसता जा रहा है। प्रदर्शन करने पर दमन का डर एक बड़ा कारण है। पहले के मुकाबले अब प्रदर्शनों को तितर-बितर करने के तरीके और भी कठोर हो गए हैं। पुलिस और प्रशासन का रवैया बदल गया है। युवाओं में यह डर बैठा दिया गया है कि सड़क पर उतरना महंगा पड़ सकता है। आगे डॉ उदितराज ने कहा कीं, नेपाल की क्रांति इसलिए सफल हुई क्योंकि वहां का युवा एक मुद्दे पर एकजुट था। भारत में, युवा मौजूद है, आक्रोश मौजूद है, लेकिन एकजुटता नदारद है। जब तक हम बंटवारे की राजनीति से ऊपर नहीं उठेंगे, डिजिटल की दीवारों को तोड़कर सड़कों पर नहीं उतरेंगे, और “भाग्य” को दोष देना बंद नहीं करेंगे, तब तक भारत का Gen Z “नकारा” ही कहलाता रहेगा। लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का अधिकार नहीं है, बल्कि सरकार को जवाबदेह ठहराने का हथियार भी है। अगर यह हथियार जंग खा गया, तो फिर कराहना ही बाकी रह जाता है।